गुरु-ज्ञान / लघुकथा संग्रह-2014 / बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु'

'गुरु-ज्ञान' में संग्रहीत लघुकथाओं  के शीर्षक :

सोच, झुका कंधा, पत्नी का रंग, पागल, प्रैक्टिकल, दर्द, माँ, मास्टर: तीन प्रश्न-चित्र, गुलाब, शिष्टाचार का चक्र, निरुत्तर ईश्वर, जनता, शुभचिंतक, सार्थकता, हिसाब गड़बड़, काजू की कतली, सही जवाब, फ़र्क, रिवाज, शुक्र है, सुधार, शर्ट, अरेंजमेंट, परिवर्तन, सीख, सबूत, दहला, इल्ज़ाम, वादा, पापा को मालूम होना चाहिए, वही वजह, समय चक्र, भरी मांग, ठोकर, ख़ास बात, ध्यान, खुलापन, समरण-शक्ति, तावीज, पुण्य-लाभ, परेशानी अपनी-अपनी, बेकार, दोनों कुत्ते हैं, क्यों मारें?, रोटी सब कुछ थी, कर्तव्य, मुफ़्त सलाह, व्यवहारिकता, पूर्णिमा, सुर्खियाँ, चूक, साहब ठीक कहते हैं, हार, वारिस, टोपी महिमा, बीरबल, सबका फ़ायदा, बदलती सोच, सहानुभूति, संतुलन, गलती किसकी?, दिया तले, बड़ा दिल, प्रतिदान, परिवार, नए साल का कैलेंडर, हक़ीकत, सौ साल बाद, ग़लत कौन?, हक़ का हिस्सा, आटे की दुल्हन, चिता, अतिरिक्त वजन, रिश्ते की मजबूती, सौभाग्य-दुर्भाग्य, सुबह का सपना, सवाल, मिट्टी का पेड़, डर, पुरखों का घर, तुलना, ख़ास दहेज़, उल्टा-पुल्टा, सेवा, लात, मददगार, कब समझूंगा?, घर, महत्वपूर्ण मंथन, सस्ता, बदलती भूमिकाएँ, निर्मल, मतलब, भय का भजन, उपयोगिता, दान-धर्म, शक्ल मिलती है, नदियाँ अब भी बहती हैं, चिर-स्थायी, अमृत से पहले, अच्छे पड़ोसी, समझदार, तुम खाओ, बुरी आदत क

सोच, झुका कंधा, पत्नी का रंग, पागल, प्रैक्टिकल, दर्द, माँ, मास्टर: तीन प्रश्न-चित्र, गुलाब, शिष्टाचार का चक्र, निरुत्तर ईश्वर, जनता, शुभचिंतक, सार्थकता, हिसाब गड़बड़, काजू की कतली, सही जवाब, फ़र्क, रिवाज, शुक्र है, सुधार, शर्ट, अरेंजमेंट, परिवर्तन, सीख, सबूत, दहला, इल्ज़ाम, वादा, पापा को मालूम होना चाहिए, वही वजह, समय चक्र, भरी मांग, ठोकर, ख़ास बात, ध्यान, खुलापन, समरण-शक्ति, तावीज, पुण्य-लाभ, परेशानी अपनी-अपनी, बेकार, दोनों कुत्ते हैं, क्यों मारें?, रोटी सब कुछ थी, कर्तव्य, मुफ़्त सलाह, व्यवहारिकता, पूर्णिमा, सुर्खियाँ, चूक, साहब ठीक कहते हैं, हार, वारिस, टोपी महिमा, बीरबल, सबका फ़ायदा, बदलती सोच, सहानुभूति, संतुलन, गलती किसकी?, दिया तले, बड़ा दिल, प्रतिदान, परिवार, नए साल का कैलेंडर, हक़ीकत, सौ साल बाद, ग़लत कौन?, हक़ का हिस्सा, आटे की दुल्हन, चिता, अतिरिक्त वजन, रिश्ते की मजबूती, सौभाग्य-दुर्भाग्य, सुबह का सपना, सवाल, मिट्टी का पेड़, डर, पुरखों का घर, तुलना, ख़ास दहेज़, उल्टा-पुल्टा, सेवा, लात, मददगार, कब समझूंगा?, घर, महत्वपूर्ण मंथन, सस्ता, बदलती भूमिकाएँ, निर्मल, मतलब, भय का भजन, उपयोगिता, दान-धर्म, शक्ल मिलती है, नदियाँ अब भी बहती हैं, चिर-स्थायी, अमृत से पहले, अच्छे पड़ोसी, समझदार, तुम खाओ, बुरी आदत। (कुल 105 लघुकथाएँ)।

बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु'।

जन्म- 31 दिसम्बर 1948, खैरागढ़, (छत्तीसगढ़)

प्रकाशन वर्ष- 2014

ISBN : 978-81-7408-734-8

Email:ggbalkrishna@gmail.com


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