अलगू और जुम्मन / कामेश्वर पंकज (सं.)
अलगू और जुम्मन
(सांप्रदायिक सौहार्द केंद्रित लघुकथा संग्रह)
संपादक
कामेश्वर पंकज,
अनाथालय रोड, लीची बगान, कटिहार-854105 (बिहार) सम्पर्क नं0-9123162131
ISBN : 978-81-986846-8-4
संपादक : मैत्रेयी प्रकाशन, दिल्ली
बी-2187, गली नं.-45, कौशिक एन्क्लेव बुराड़ी, दिल्ली-110084
सम्पर्क : 9431693352
E-mail: maitreyipublication@gmail.com
कामेश्वर पंकज (संपादक)
प्रथम संस्करण : 2025
मूल्य : 300/-
मुद्रक :
प्रिन्ट प्लाजा, गर्ल्स स्कूल रोड, कटिहार प्रमोद कुमार चौधरी, मो0-9905003820
Algoo aur Jumman (A Laghukatha sangrah) Edit by Kameshwar Pankaj
अनुक्रम
लेखक
1. कामेश्वर पंकज
2. क. चन्द्रकिशोर जायसवाल
ख. सुरेश चन्द्र सरस
3. महेश दर्पण
4. संजीव बक्शी
5. बलराम
6. संजय कुमर सिंह
7. देवेन्द्र कुमार देवेश
8. दीर्घ नारायण
9. शिवनारायण
10. राधे श्याम तिवारी
11. डॉ. अनिल सुलभ
12. रणविजय सिंह सत्यकेतु
13. निशांत
14. मनोज पराशर
15. अनवर इरज
16. हरि दिवाकर
17. सुरेश चन्द्र शुक्ल शरद आलोक
18. सजल प्रसाद
19. खगेश व्यास
20. आरती स्मित
21. बिनोद कुमार मिश्र
22. राजू दत्ता
23. निरूपमा राय
24. दीपा गुप्ता
25. अलका वर्मा
26. अतुल मल्लिक अनजान
27. अजय कुमार मीत
28. राकेश रोहित
29. बिनोद कुमार नैतिक
30. अशोक कुमार
31. अजय जुगरान
32. दिवाकर पाण्डेय दिलारपुरी
33. कन्हैया प्रसाद केशरी
34. बिपिन वियानी हिन्दुस्तानी
35. दशरथ सिंह
36. अंजुम कौशर
37. पी. पी. सिन्हा
38. कमल किशोर चौधरी
39. विश्वनाथ राम कुशवाहा
40. प्रकाश कुमार
41. साकिब कलीम
42. नृपेन्द्र गुप्ता
43. सहदेव मिश्र
44. उमेश कुमार (आर्य)
45. अख्तर बहार
46. जवाहर देव
47. अवध बिहारी आचार्य
48. सुरेश चन्द्र सरस
49. कामेश्वर पंकज
संपादकीय
कथा साहित्य में गागर में सागर भरने की क्षमता लघुकथा में है। लघुकथा लेखक और पाठक की दुनिया में अति प्रचलित विधा है। व्यस्त जीवन में क्षिप्र गति से साहित्यिक आनंद देने में सर्वाधिक कारगर विधा लघुकथा ही है, इसलिए यह बहुत ही लोकप्रिय हो गई है। आज हर साहित्यिक पत्रिका में लघुकथा की अपनी जगह है। यद्यपि आधुनिक सभी गद्य विधाओं के उद्भव को पश्चिम के साहित्य से जोड़ने की प्रवृत्ति हमारे समीक्षकों में है तथापि हिन्दी साहित्य में लघुकथा का उत्स खोजा जाए तो निश्चय ही पंचतंत्र और हितोपदेश से आरंभ करना होगा.... समय के साथ स्वरूप में परिवर्तन होता आया है। यह परिवर्तन समय-समाज सापेक्ष है। इसी सापेक्षता के कारण इस संग्रह में लघुकथा को मैंने विषय में बांधने का प्रयास किया है। विषय है- 'सांप्रदायिक सौहार्द। यह संकलन किसी भी देश या समाज के उन लोगों को समर्पित है, जो किसी भी सांप्रदायिक घृणा और विद्वेष से पीड़ित हैं ।
धार्मिक होना हमारा स्वभाव है। यह एक पवित्र भाव है। यह अपवित्र तब हो जाता है जब अन्य धर्मों के प्रति हममें विद्वेष और घृणा का भाव आता है। यह अपवित्र भाव किसी भी सभ्य समाज में मान्य नहीं है। यह स्थिति किसी भी समाज या राष्ट्र के लिए सुखद नहीं है। इस दुनिया में ऐसे भी बहुत से देश है, जहाँ सांप्रदायिक कट्टरता और घृणा का भाव जगजाहिर है। हम इसकी घोर निंदा करते हैं। मैं मुसलमान हूँ, आप हिंदू हैं, आप इसाई हैं, इसमें बुराई कहां है ? यह हमारा स्वभाव और संस्कार है। बुराई तब है, जब हम मुसलमान होकर या हिंदू होकर अन्य संप्रदाय के प्रति घृणा और विद्वेष रखते हैं। लेकिन हमारे समय और समाज में कुछ लोग ऐसे हैं-इस बात से हम इनकार नहीं कर सकते। हम कलाकार और रचनाकार इस घृणा और विद्वेष को मिटाना चाहते हैं, यह हमारा लेखकीय दायित्व भी है।
इसी दायित्व का हम निर्वाह कर रहे हैं। मैंने रचनाकारों से निवेदन किया है कि वे विषय केंद्रित रचनाएं भेजे, लेकिन यह अनिवार्य नहीं था। इसलिए इस संकलन में बहुत सारी रचनाएं विषय से हटकर हैं। इसे मैं उनकी अति व्यस्तता ही मानता हूँ, विषय का अनादर नहीं। इन रचनाओं में कुछ रचनाएँ आप को स्तरीय नहीं भी लग सकती है। परंतु उनके भाव ईमानदार हैं, सच्चे है।
संपादकीय दायित्व का निर्वाह करते हुए मैंने प्रयास किया है कि किसी कहानी से किसी का मन आहत नहीं हों। ये कहानियाँ हमारे समाज की सच्चाई होते हुए भी काल्पनिक हैं और काल्पनिक होते हुए भी समाज की सच्चाई है। साहित्य का सच भी यही होता है। इसी अर्थ में साहित्य समाज का दर्पण है।
इस संग्रह में प्रकाशित तमाम रचनाकारों का विशेषतः महानुभाव कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल, महेश दर्पण जी. संजीव बख्शी जी, डॉक्टर दीर्घ नारायण जी, डॉ संजय कुमार सिंह जी, शिवनारायण जी, राधेश्याम तिवारी जी, निशांत जी, प्रो. सजल प्रसाद जी, डॉ मनोज पराशर जी, रण विजय सिंह 'सत्यकेतु' जी, हरी दिवाकर जी, डॉ अलका वर्मा जी, डॉ निरुपमा जी, डॉ आरती स्मित जी, राजू दत्ता जी, अतुल मल्लिक अंजान जी अनिल कुमार पंकज जी, डा. अलका जी, जी, पी. पी. सिन्हा जी, दीपा गुप्ता जी, अजय जुगरान जी, सुरेश चन्द्र सरस आलोक जी, बलराम जी, के. के. चौधरी जी आदि का मैं हृदय की अतल गहराइयों से आभार प्रकट करता हूँ कि इन महानुभावों ने अपनी अमूल्य रचना देकर मेरे आग्रह का मान रखा। मैं इन महानुभावों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन कटिहार के तमाम लेखकों सदस्यों, पदाधिकारियों एवं संरक्षकों का भी मैं आभार प्रकट करता हूँ। संस्था के अध्यक्ष डॉ सुरेश चंद्र सरस जी का में विशेष आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे सदा ही उत्साहित और प्रोत्साहित किया है। आप सबके ही प्रयास से यह संग्रह सुधि पाठक के हाथों में है। किसी रचना का पाठक ही उसका प्रथम समीक्षक होता है, इसी भाव से आप सबको शत शत प्रणाम !
● कामेश्वर पंकज
प्रो. (डा) कामेश्वर पंकज
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग पूर्णियां विश्वविद्यालय पूर्णियां, बिहार
जन्म स्थान : बेलवा, कटिहार, बिहार
सम्प्रति निवास : लीची बागान, अनाथालय रोड, कटिहार, (बिहार) पिन : 854105
मोबाइल : 9123162131
शिक्षा : ग्रामीण विद्यालय, दर्शन साह महाविद्यालय, कटिहार बिहार विश्वभारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन, बोलपुर (प.बं.)
जीविका : विश्वविद्यालय आचार्य पद से सेवानिवृत्त
अब : कृषक और स्वतंत्र लेखन।
रचनाएँ : 1. अप्रस्तुत योजना : स्वरूप और विश्लेषण
2. महादेवी वर्मा के काव्य में अप्रस्तुत योजना का सौंदर्य
3. लड़की होने की सजा कब तक (काव्य संग्रह) : संपादक
प्रकाशनार्थ : फणीश्वर नाथ रेणु राग और रंग, कथाकार रूपचंद (कहानी संग्रह) राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित विविध आलेख ।


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